मैं बीते वक्त में जाना चाहता हूं
कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहां हम सही होते हुए भी कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। जहां सच हमारे साथ होता है, लेकिन सवाल हमसे पूछे जाते हैं। जिन रिश्तों को हमने प्रेम, स्नेह और विश्वास से सींचा होता है, वही रिश्ते एक दिन हमारे इरादों पर शक करने लगते हैं। तब मन अनायास ही पीछे की ओर भागता है। लगता है काश, बीते वक्त में लौट पाते और खुद से कह पाते—संभल जाओ, भविष्य हमारे साथ ऐसा कर सकता है।
ऐसे समय में मन में एक ही वाक्य गूंजता है—मैं बीते वक्त में जाना चाहता हूं। भूतकाल को बदलने के लिए नहीं, बल्कि वहां खड़े होकर खुद से मिलने के लिए। जब सोच और गहरी होती है, तो यह सवाल उभरता है कि जहां हम सही थे, वहां भी हम किसी को समझा क्यों नहीं पाए? शायद इसलिए कि कुछ लोग सच समझना चाहते ही नहीं। दुनिया तब बड़ी सहजता से कह देती है—जो बीत गई, सो बात गई।
लेकिन सच्चाई यह है कि घटनाएं बीत जाती हैं, लोग दूर हो जाते हैं, शब्द खो जाते हैं… पर जो भावना आहत हुई होती है, जो फांस मन में चुभ जाती है, वह रह जाती है। वही फांस, जो हर आत्मसंवाद में फिर से चुभती है।
हममें से कई लोग अपनी खुशियों की चाबी दूसरों के हाथों में सौंप देते हैं। किसी की प्रतिक्रिया पर खुश होना, किसी की बेरुखी पर टूट जाना—और फिर खुद के लिए जीना भूल जाना। कुछ लोगों के असली चेहरे देर से समझ आते हैं, तब जब भरोसा टूट चुका होता है। तभी अतीत में लौट जाने की चाह सबसे ज्यादा होती है।
अगर आप भी अपनी जिंदगी खुद नहीं जी रहे हैं, अगर आपकी खुशी किसी और की सुविधा पर टिकी है, अगर आपने अपनी मुस्कान की चाबी दूसरों के हाथ में दे रखी है—तो अभी भी समय है। रुकिए। खुद से बात कीजिए। खुद को यह जताइए कि अपने लिए खुश रहना कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि आपका स्वाभिमान और आत्मसम्मान है।
अक्सर मैं खुद से यह भी सोचता हूं कि क्यों न मैं भी दुनिया की तरह हो जाऊं। आज की यह भौतिकवादी, AI और रोबोटिक होती दुनिया, जहां संवेदनाओं से ज्यादा सुविधा की कीमत है। जहां मानवीय मूल्यों वाले जज्बातों की कदर कम होती जा रही है। क्यों न मैं भी आत्मकेंद्रित हो जाऊं, भावनाओं से थोड़ा दूर, रिश्तों से पहले अपने कंफर्ट को रखूं। मानवीयता से पहले निजी हितों को देखूं और रिश्तों की सुविधा से ज्यादा अपने कंफर्ट पर फोकस करूं। ना कहकर देखूं मैं भी किसी से और अहसास कराउं उन्हें कि वह गलत हैं।
लेकिन सच यह है कि मैं ऐसा नहीं हो पाऊंगा। मैं मानवीय हूं—और मुझे इस पर गर्व है। हां, यह मेरी कमजोरी भी है और मेरी ताकत भी।
मैं आज भी उनके लिए खड़ा रहूंगा। आज भी संवाद करूंगा। आज भी दूसरों की सुविधा देखूंगा। किसी की आंखों में उम्मीद होगी तो मैं पिघल जाऊंगा, किसी का दर्द होगा तो मेरा हाथ खुद-ब-खुद बढ़ जाएगा।
बस मैं खुद को बचाने की कोशिश जरूर करूंगा। कितना सफल हो पाऊंगा, यह वक्त बताएगा। बस इतना चाहता हूं कि कल फिर यह न कहना पड़े— कि मैं बीते वक्त में जाना चाहता हूं।
— आपका सुमित

शानदार
जवाब देंहटाएंA hi sach hai jeevan ka
जवाब देंहटाएंतुम अपनी समझ और विवेक
जवाब देंहटाएंणके अनुसार कार्य करते रहो...
नतीजों की चिंता मत करो...
गीता का सार (सीख) भी यही है और रामायण का सार भी यही है ...
सुनहुं भरत , भावी प्रबल...
बिलखी कहेहू मुनि नाथ..
लाभ हानि ,जीवन मरण
यश अपयश विधि हाथ ।
सुनहुं भरत,भावी प्रबल...
बीते वक्त में जाकर भी आप कुछ बदल नहीं पाओगे सिवाय स्वयं के…क्योंकि
जवाब देंहटाएंआपका सहज स्वभाव, आपका उदार व्यक्तित्व और सबकुछ जानकर भी आपकी मौन मुस्कुराहट…आपको बुरे को बुरा कह देने की इजाज़त भी नहीं देती।
मेरे लिए आप ‘समझदार’ की पूर्ण परिभाषा और महान शख्शियत हैं।
एकदम सटीक है सुमित,ये तो दुनिया की रीत है,इसे समझते समझते समय निकल जाता है। ये बात अलग है कि हम अपने संस्कारों पर चलते है और दुनिया तेजी से प्रैक्टिकल लाइफ की तरफ बढ़ रही है। फिर भी मैं यही चाहूंगा कि हम जैसे है वैसे ही अच्छे है। सभी धर्म ग्रन्थ भी यही कहते है। जिसका जितना भला कर सको कर दो,कोई अपेक्षा मत रखो तो दुखी होगे ही नहीं।बहुत दिनों बाद तुम से लेखनी के माध्यम से संवाद हो रहा है।💐🙏
जवाब देंहटाएंAekdam shi bat likhi he sumy
जवाब देंहटाएंBahut बहुत खूबसूरत व्याख्या और अत्यंत सुगम शब्दों में प्रस्तुत विचार।✍🏻हमें आप जैसे लेखक के विचार पढ़ने का अवसर मिला, यह हमारे लिए गर्व की बात है।🙏🏻इस सृजन को साझा करने के लिए हृदय से धन्यवाद, सर। 🫡 आप पर सचमुच गर्व है।
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