तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं


साल 1983 में एक फिल्म आई थी मासूम। इस फिल्म में गुलजार साहब का लिखा एक बहुत ही मशहूर गाना है ‘‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं’’ जीवन के उतार-चढ़ावगमदर्द और समझौतों को बयां करता यह गीत आज के जीवन पर भी उतना ही सामयिक नजर आता है। हम सभी कहीं न कहीं जिंदगी के सवालों से परेशान हैं। अगर गहराई में जाकर सोचें तो हमें नजर आएगा कि इस तनाव का कारण है हमारी उम्मीदें।

आपने लोगों को अक्सर बोलते सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि मैंने उसके लिए कितना कुछ किया लेकिन उसने मेरे साथ बुरा व्यवहार कियामेरी जरूरत के समय वह मेरे साथ नहीं था या मैंने हमेशा उसे प्राथमिकता दी लेकिन उसकी जिंदगी में मेरी इंर्पोटेंस नहीं है। चिंताशंकाभयअहंकारस्वार्थ और पूर्वाग्रह जैसी भावनाओं के कारण हमारे जीवन में तनाव बढ़ रहा है और इस तनाव का सबसे बड़ा कारण है लोगों का हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरना। असल में हम अपने परिवारदोस्तप्रेमीरिश्तेदारबॉसऑफिस के सहकर्मी और सोसायटी से इतनी उम्मीदें पाल लेते हैं कि जब वह पूरी नहीं होतीं तो हमें दुख होता है।

कई बार जब हम जिंदगी में पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें लगता है कि हमने दूसरों के लिए जीवन में कितना कुछ किया लेकिन बदले में हमें क्या मिला। कभी हम काश की कल्पनाओं में खो जाते हैं और जब वास्तविता से हमारा परिचय होता है तो हमारा दिल टूट जाता हैवहीं कई बार हम दूसरों पर इतना निर्भर हो जाते हैं कि जब वह जरूरत के समय हमारे साथ खड़े नहीं होते तो हमें दुख होता है।

उस समय जिंदगी से रूबरू होकर बैठें तो लगता है कि कहने को तो पूरी दुनिया साथ है लेकिन दिल की तन्हाई किसी से बयां नहीं कर सकते। जिंदगी में गम हमें रिश्तों की नई परिभाषा सीखा देते हैंमन कहता है कि शायद कसूर अपना ही है कि क्यों उम्मीद के रास्ते पर हम यूं ही भटकते रहे।

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा तो है लेकिन इसका हल क्या है। इसका केवल एक हल है आपको दूसरों को बदलने के प्रयास छोड़कर खुद को बदलना होगा। आप किसी से कितना ही प्रेम करेंकितना ही समर्पण दिखा लें लेकिन कोई खुद को आपके अनुसार नहीं बदलेगा। जिंदगी अपने मासूम सवालों से यूंही परेशान करती रहेगी। इन सवालों का जवाब हमें अकेले ही देना होगा।

हम जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैंकुछ हासिल करना चाहते हैं और कुछ नया करना चाहते हैं। इन सपनों को साकार करने के लिए हम प्रयास करते हैं कि परिवार के लोग उनके सोचने के तरीके को बदल देंसमाज के लोग नजरिए को बदल दें और ऐसा होने पर हम दुनिया को बदल देंगे लेकिन ऐसा होता नहींक्योंकि किसी ओर चीज को बदलना हमारे अधिकार में नहीं है। इस दुनिया को बदलना या व्यक्ति के विचारों को अपने अनुसार ढाल देना हमारे अधिकार में नहीं है। अगर जीवन में खुश रहना है तो दुनिया को नहीं खुद को बदलें।

सोचिए कि आपको किसी पहाड़ पर चढ़ना है तो आप पर्वत के आकार को बदलने का प्रयास करेंगे या पर्वत पर चढ़ने की तैयारी में जुटेंगे। फूलों को देखिये उनका काम है खूशबू देनावह कभी नहीं सोचते कि काटों को पेड़ों से हटा दूं। केवल खुशबू और सुंदरता बिखरने का अपना कर्म करते हैं। हमें भी ऐसा ही होना होगा।

यह कहना ही बड़ा मुश्किल है लेकिन हमें इसे करना पड़ेगा कि लोगों से उम्मीद करना छोड़ दें क्योंकि जब उम्मीदें टूटती हैं न तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर टूटती हैं। खुशियांभावनाएंभरोसा और बंधन सभी टूटने लगता है। इसलिए बेहतर है कि किसी से उम्मीद ही न करें। इससे हमारी भावनाओं में भरा उम्मीदों का बोझ भी कम हो जाएगा और अगर बिना उम्मीद के कुछ मिलेगा तो वह हमें खुशी ही देगा।

ऐसे में हमें बाहर की दुनिया को नहीं बल्कि अपने अंदर की दुनिया को समझने का प्रयास करना होगा। जब हम अपने अंदर की दुनिया को समझ जाएंगे तो दुनियादारी की मृगतृष्णा ही खत्म हो जाएगी। आत्मानंद की कस्तूरी से हम खुद भी महकेंगे और दुनिया को भी इस सुगंध से मंत्रमुग्ध कर देंगे।

 

 


टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छा लिखा है सुमित जी

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  2. जीवन की यथार्थ संजोय है

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  3. नेकी कर दरिया में डाल यदि इस मानसिकता से जीवन जिए तो कभी कोई दुख पछतावा महसूस नहीं होगा, कोई अपेक्षा न रखे, अच्छा लिखा सुमित

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  4. 100%Right kisi se ummid nahi rakhana chahiye

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