‘अस्तित्व’ और ‘अधूरेपन’ के बीच अटका एक रिश्ता

 


किसी को खो देना पहाड़ जैसा दुख देता है, और किसी का साथ छूट जाना एक गहरी टीस। लेकिन इस दुनिया में एक दर्द ऐसा भी है जो इन सबसे कहीं अधिक खौफनाक है, वह दर्द, जहाँ कोई आपको न तो पूरी तरह पाना चाहता है और न ही पूरी तरह खोना चाहता है।
यह वह रिश्ता है जो दिल की नसों पर सुई बनकर चलता है। न यह आपको जकड़ता है, न ही आजाद करता है; बस आपको एक ऐसे हुए मोड़ पर छोड़ देता है, जहाँ आपकी आत्मा हर दिन थोड़ी-थोड़ी खोखली होती रहती है।
जब मरहम ही घाव बन जाए
पहला दर्द: जो आपको चाहता था, पर हालात ने छीन लिया
वह इंसान जिसने आपकी मुस्कान में अपना भविष्य देखा था, जिसने सपनों के हर कोने में आपका नाम लिख दिया था। जब ऐसा इंसान सामाजिक मजबूरियों या पारिवारिक उलझनों के कारण दूर होता है, तो दिल चुपचाप टूट जाता है। यह घाव गहरा होता है, बहुत तेज़ होता है, पर समय की धूल इसे धीरे-धीरे भर देती है।

मकतब-ए-इश्क का दस्तूर निराला देखा,
उसकी छुट्टी न मिली, जिसको ये सबक याद हुआ।

दूसरा दर्द: जो साथ था, पर आगे बढ़ गया
यहाँ हँसी थी, यादें थीं, और साथ जीने के वादे थे। पर एक दिन वह इंसान आपकी दुनिया को 'सिर्फ एक हिस्सा' समझकर आगे बढ़ जाता है। आप वहीं रह जाते हैं, एक पुरानी चैट, एक अनकहे संदेश या एक धुंधली तस्वीर की तरह। यह दर्द भारी है, लेकिन इसकी एक नियति है, एक अंत है।

वो चल दिया तो राहें भी ख़ामोश हो गईं,
हम एक मोड़ पर ठहरे, वक़्त आगे बढ़ गया।

तीसरा दर्द: जो न चाहता है, न छोड़ता है
यह वह रिश्ता है जहाँ सामने वाला आपकी आत्मा की डोर पकड़कर बस खेलता रहता है। वह अचानक आता है, मीठी बातें करता है, आपके भीतर उम्मीदों की बुझती लौ को फिर से जला देता है। आप फिर से समर्पित हो जाते हैं, और जैसे ही आप संभलने लगते हैं, वह फिर से दूरी बना लेता है। असली पीड़ा यहाँ शुरू होती है।
आपका दिल उसके आने से धड़कता है और उसके अचानक चले जाने से जैसे थम जाता है। यह दर्द कभी खत्म नहीं होता क्योंकि यह एक 'चक्र' है, थकाता हुआ और हर बार आपको थोड़ा और तोड़ता हुआ।
उसकी हर वापसी आपकी टूटी हुई दीवारों पर उम्मीदों का नया पेंट कर देती है। और उसका फिर से चले जाना, उसी पेंट को खुरच-खुरचकर घाव को पहले से कहीं ज्यादा गहरा कर देता है। आप मरते नहीं हैं, बस धीरे-धीरे मिटते जाते हैं। यह स्थिति आपकी अस्मिता, आपका आत्मविश्वास और आपका सुकून सब कुछ निगल जाती है।
एक सच्चाई यह भी है कि उसे मेरे हर दर्द की दवा पता है,
गिला यह है कि वह कभी दवा तो नहीं देता,
और हैरत यह कि हम बीमार क्यों हैं वह इस पर नाराज है.
जो इंसान आपको पाना चाहता है, वह आपको 'आस' देता है। जो आपको छोड़ देता है, वह एक 'अंत' देता है। पर जो न आपको पाना चाहता है और न ही खोना चाहता है, वह आपको 'अधूरा' छोड़ देता है। और यकीन मानिए, इस पूरी कायनात में 'अधूरा' होना सबसे बड़ी सजा है।
अपनी अधूरी कहानी को खुद पूरा कीजिए
अक्सर हम इस इंतज़ार में अपनी ज़िंदगी गिरवी रख देते हैं कि सामने वाला हमें या तो मुकम्मल कर देगा या मुक्त कर देगा। पर हकीकत यह है कि जो रिश्ता आपको सुकून न दे सके, उसे ढोना अपनी रूह के साथ नाइंसाफी है।
दर्द को महसूस कीजिए, जी भर के रो लीजिए, क्योंकि यह आपके होने की तस्दीक है। लेकिन याद रखिए, किसी और के आने या जाने के खेल में आप 'खिलौना' नहीं हैं। अगर कोई आपको आधा-अधूरा रखकर अपना अहंकार पाल रहा है, तो उस कहानी को 'विराम' देने की जिम्मेदारी आपकी अपनी है।
अस्तित्व उनका नहीं खोता जो छोड़ दिए जाते हैं, अस्तित्व उनका खो जाता है जो न छोड़े जाते हैं और न अपनाए जाते हैं। अपनी डोर अपने हाथ में थामिए, क्योंकि अधूरापन आपकी नियति नहीं हो सकती।
कहानी और भी है… पर आज बस इतना ही,
मैं हँसकर भी सुनाऊँगा तो आप रो पड़ेंगे...

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