‘अस्तित्व’ और ‘अधूरेपन’ के बीच अटका एक रिश्ता
किसी को खो देना पहाड़ जैसा दुख देता है, और किसी का साथ छूट जाना एक गहरी टीस। लेकिन इस दुनिया में एक दर्द ऐसा भी है जो इन सबसे कहीं अधिक खौफनाक है, वह दर्द, जहाँ कोई आपको न तो पूरी तरह पाना चाहता है और न ही पूरी तरह खोना चाहता है। यह वह रिश्ता है जो दिल की नसों पर सुई बनकर चलता है। न यह आपको जकड़ता है, न ही आजाद करता है; बस आपको एक ऐसे हुए मोड़ पर छोड़ देता है, जहाँ आपकी आत्मा हर दिन थोड़ी-थोड़ी खोखली होती रहती है। जब मरहम ही घाव बन जाए पहला दर्द: जो आपको चाहता था, पर हालात ने छीन लिया वह इंसान जिसने आपकी मुस्कान में अपना भविष्य देखा था, जिसने सपनों के हर कोने में आपका नाम लिख दिया था। जब ऐसा इंसान सामाजिक मजबूरियों या पारिवारिक उलझनों के कारण दूर होता है, तो दिल चुपचाप टूट जाता है। यह घाव गहरा होता है, बहुत तेज़ होता है, पर समय की धूल इसे धीरे-धीरे भर देती है। मकतब-ए-इश्क का दस्तूर निराला देखा, उसकी छुट्टी न मिली, जिसको ये सबक याद हुआ। दूसरा दर्द: जो साथ था, पर आगे बढ़ गया यहाँ हँसी थी, यादें थीं, और साथ जीने के वादे थे। पर एक दिन वह इंसान आपकी दुनिया को 'सिर्फ एक हिस्सा' समझ...